बौद्ध धर्म, श्री लींका और अनागररक धर्मपाल

17 सितम्बर, 2021, को अनागररक धर्मपाल की 158 वी ीं जयींती पर सवशेष

छठी सदी ईसा पूर्व में गौतम बुद्ध ने करुणा, प्रेम और मानव कल्याण का शंखनाद कर भारत सहित विश्व में शांति का पुष्प पल्लवित किया । दुःख के कारण और समाधान का मार्ग बता कर बुद्ध ने मानवता को मुक्ति का मार्ग बताया। तीन सौ वर्षों बाद सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और संदेशों को कालजयी बना दिया। उसके शासन काल में यह सिद्धांत और मार्ग भारत सहित श्री लंका, यूनान, बर्मा, थाईलैंड और चीन में लोकप्रिय हो चुका था । अशोक के बाद बौद्ध धर्म कई झंझावातों से गुज़रा। इसे कई सम्राटों और राजाओं का संरक्षण भी मिला लेकिन कई विरोधी मतावलम्बियों और संघों के मतभेद ने बौद्ध धर्म को कमज़ोर करना शुरू किया और आपसी विवाद के कारण यह धर्म अपनी विश्वसनीयता खोने लगा। बारहवीं सदी तक यह धर्म पूरी तरह लुप्त होकर अतीत में खो गया । विदेशी आक्रमण और राज्य उदासीनता के कारण कई बौद्ध विहार और साहित्य नष्ट हो गए।

प्रसिद्द बौद्ध स्थल सारनाथ, बुद्धगया, कुशीनगर और साँची खँडहर में बदल गए थे । उन्नीसवीं सदी के आरम्भ ने बौद्ध धर्म के पुनः जागरण का इतिहास लिखना शुरू किया। भारत और सीलोन उन दिनों ब्रिटिश दासता की त्रासदी झेल रहा था। दोनों देश स्वतंत्रता और राष्ट्रवाद के लिए संघर्ष कर रहे थे। सौभाग्य से ब्रिटिश शासन की ओर से कई पुरातत्ववेत्ता, अधिकारी और शोधार्थी – जॉनसन, एलेग्जेंडर कन्निंघम, मेसी और मार्शल जैसे लोग भारत आये और साँची, सारनाथ, बुद्धगया, नालंदा, राजगृह और कुशीनगर की खोज कर वहां की महत्ता को लिपिबद्ध किया। सरकारी अधिकारी होने के कारण इन पुरा- सम्पदाओं और स्थलों के स्वामित्व के निर्णय नहीं ले सकते थे। बौद्ध अनुयायी वहां पर नहीं थे। कल्पना कीजिये, बौद्ध धर्म के दो मुख्य केंद्र,सारनाथ और बुद्ध गया वर्त्तमान में न होते। सारनाथ जंगली जानवरों की चरागाह और बुद्धगया किसी महंत के कब्ज़े में होता, ऐसी स्थिति में क्या भारत बौद्ध धर्म का पवित्र स्थल रह पाता ? बुद्धगया और सारनाथ बुद्ध धर्म उद्गम स्थली के बावजूद श्रीलंका, थाईलैंड, जापान और चीन महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल होते।

आज से 158 साल पहले बौद्ध धर्म की दिशा और दशा परिभाषित करने के लिए भारत के पड़ोसी देश सीलोन में एक क्रन्तिकारी युगपुरुष का जन्म 1864 में हुआ, जिसका नाम डान डेविड हेववितरण रखा गया। जो युवावस्था में अनागरिक धर्मपाल के नाम से बौद्ध धर्म ज्ञानपुंज भारत सहित पश्चिमी देशों में भी प्रकाशित कर गया। यह उनदिनों की बात है जब भारत और सीलोन अंग्रेज़ों के गुलाम थे। राजनीतिक व्यवस्था तो थी ही नहीं और धर्म, समाज कल्याण और राष्ट्रीय चेतना की चर्चा करने वाले अपराधी माने जाते थे। अनागरिका धर्मपाल अंग्रेज़ों की अधीनता के विरुद्ध सीलोन में जन चेतना जागृत करने में जुट गए और आत्मसम्मान और धर्म रक्षा का आंदोलन शुरू कर दिया।

धर्मपाल के दादा हेववितरण डिंगरी अप्पुहामी मातर के संपन्न किसान थे। उनके दो पुत्र थे, पहले अत्थदासी थेरो,राज महाविहार के विहाराधिपति थे। दूसरे डान कार्लोस हेववितरण कोलंबो के फर्नीचर व्यापारी थे। उनकी शादी कोलंबो के व्यापारी की पुत्री मल्लिका से हुई थी। डॉन बौद्ध धर्म के अनुयायी थे। 17 सितम्बर 1864 को जन्मे पुत्र का नाम वहां की परंपरा के अनुसार डान डेविड हेववितरण रखा गया। सीलोन में चर्च के कठोर नियम और आदेश के बावजूद उनके माता पिता ने उन्हें बौद्ध शिक्षा और परंपरा का ज्ञान देते और अक्सर उन्हें विहार ले जाते। पांच वर्ष की आयु में उन्हें पहले सेंट थॉमस और बाद में सेंट बेनेडिक्ट स्कूल में भर्ती कराया गया। बौद्ध धर्म में आस्था के कारण स्कूल और कॉलेज में उनका प्रशासन और छात्रों से विवाद हो जाता था। युवावस्था में सीलोन के दो विद्वान् भिक्षु सुमंगल और गुणानंद थेरो से बहुत प्रभावित

थे। 1880 में अपने घर वालों की अनुमति से आजीवन ब्रह्मचर्य रहने का संकल्प लिया और धम्म सेवा के लिए अपना नाम बदल कर अनागरिक धर्मपाल रख लिया। अब उन्होंने अपना जीवन मानव कल्याण और धर्म सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
उन्हीं दिनों उनकी मुलाक़ात ब्रिटेन के थियोसोफिस्ट कर्नल हेनरी स्टील अल्काट और रूस की मेडम ब्लाडवासकी से हुई जो धर्म प्रचार के लिए सीलोन आये थे। 1880 में दोनों ने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और श्रीलंका में धम्म प्रचार का प्रयास शुरू किया। कर्नल अल्काट सीलोन में शिक्षा और धार्मिक जागृति के जनक माने जाते है। शिक्षा के प्रसार के लिए उन्होंने वहां 300 स्कूल खोले और एक बौद्ध धर्म प्रश्नावली तैयार की। बौद्ध ध्वज को उन्होंने ही डिज़ाइन किया था। उन्होंने बौद्ध धर्म के दो मतों थेरवाद और महायान को साथ लाने का प्रयास किया।

धर्मपाल 1883 में सरकारी नौकरी छोड़ वह अल्काट के साथ पूरी तरह जुड़ गए। उनके मार्गदर्शन में राष्ट्रीय आंदोलन के माध्यम से शिक्षा, धर्म प्रचार और बौद्ध स्थलों के पुनर्निर्माण का कार्य करने लगे। 1888 में इंग्लिश समाचार पत्र द बुद्धिस्ट का प्रकाशन शुरू किया। अब तक धर्मपाल सीलोन के मुखर क्रन्तिकारी और धर्म प्रचारक बन चुके थे। दिसंबर १८९० में धर्मपाल एक जापानी भिक्षु कोजन गुणरत्न के साथ सारनाथ और बुद्धगया तीर्थ यात्रा पर आये। बुद्धगया और बोधिवृक्ष की दयनीय स्थिति से वह काफी व्यथित हुई। अपनी मनोदशा के बारे में उन्होंने डायरी में लिखा,

‘मैंने जैसे ही वज्रासन पर सर झुकाया, मस्तिष्क में एक चेतना जागृत हुई। उसने मुझे यहीं रुक जाने और बुद्ध की ज्ञान स्थली की रक्षा की प्रेरणा दी “

धर्मपाल ने अपना जीवन बुद्धगया स्थित वज्रासन की गरिमा को वापस दिलाने का निश्चय किया। वहां से वह बर्मा की राजधानी रंगून गए और बौद्ध अनुयायियों से बुद्धगया की समस्यायों पर चर्चा की। अब उनका उद्देश्य बोधगया को फिर से बौद्ध पवित्र स्थल के रूप में मान्यता दिलाना था। 31 मई 1891 को उन्होंने कोलंबो में बुद्धगया महाबोधि सोसाइटी की स्थापना की जिसके अध्यक्ष श्रीलंका के विद्वान् धर्म गुरु हिक्कदुवे श्री सुमंगल नायक थेरो चुने गए। कर्नल अल्काट डायरेक्टर और अनागरिक धर्मपाल महासचिव बने। सोसाइटी का मुख्य उद्देश्य बुद्धगया मंदिर को मुक्त कराना, भारत में बौद्ध विहारों और मंदिरों का जीर्णोद्धार,और बौद्ध विद्यालय स्थापना था। इसके अलावा बुद्धगया में विदेशी भिक्षुओं के लिए आश्रम बनाना था। इसी साल सीलोन से चार भिक्षुओं को बोधगया ले कर आये और बर्मा नरेश द्वारा बनवाये धर्मशाला में रखा । कठिन परिस्थितियों और विरोध के बावजूद चारो भिक्षु बड़े धैर्य से धम्म सेवा करते रहे। कुछ दिनों बाद वह कर्नल अल्काट के साथ बर्मा गए और संदिमरामा मंदिर के प्रधान से वहां के दो भिक्षु शिन चंद्रा और शिन थुरिया को बुद्धगया भेजने का आग्रह किया । यह महत्वपूर्ण है कि शिन चन्द्र बाद में भदन्त चन्द्र मणि महाथेरो के नाम से प्रसिद्ध हुए हुए । 1902 में सारनाथ और कुशीनगर में बर्मी मंदिर का निर्माण किया। भदन्त चन्द्र मणि महाथेरो 1956 में बाबा साहब के नागपुर दीक्षा समारोह के प्रमुख भिक्षु थे।

1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में आयोजित विश्व धर्म संसद उन्नीसवीं सदी की एक महत्वपूर्ण घटना थी। संसद का उद्देश्य विश्व के विविध धर्म सिद्धांतों और विचारधारा को एक मंच पर लाना था। धर्म संसद के प्रमुख डॉक्टर बार्टी धर्मपाल के धर्म प्रचार और विद्वत्ता से बहुत प्रभावित थे। महाबोधि जर्नल के माध्यम से उन्हें बौद्ध धर्म के बारे में उनके विचार उनतक पहुँचते थे। धर्मपाल को धर्म संसद में दक्षिण बौद्ध विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में आमंत्रित किया गया। 21 सितम्बर 1893 को धर्म सम्मलेन में उन्होंने बौद्ध दर्शन, साहित्य, मीमांसा, करुणा, प्रेम, मानव कल्याण और चार आर्यसत्य पर बड़ा ही प्रभावशाली और ओजपूर्ण उद्बोधन किया। सम्मलेन में मौजूद विश्व के विभिन्न धर्मावलम्बी, विचारक, समाज सुधारक दार्शनिकों ने उनके विचारों की सराहना की। पहली बार यूरोपीय समुदाय के बीच बौद्ध दर्शन का विश्लेषण

अनागरिक धर्मपाल ने किया । धर्म संसद में ही उनकी मुलाक़ात स्वामी विवेकानंद से हुई। बाद में दोनों घनिष्ट मित्र और शुभचिंतक बन गए।
धर्म संसद के बाद जापान जाते समय उनकी मुलाक़ात अमेरिका के एक धनी बैंकर की पत्नि मेरी एलिज़ाबेथ फोस्टर से हुई। फोस्टर धर्मपाल के मिशन से बहुत प्रभावित हुईं और वह उनकी स्थाई मददगार बन गयी। धर्मपाल के भारत मिशन, बोधगया केस, सारनाथ में मूलगंध कुटी विहार के निर्माण, महाबोधि जर्नल के प्रकाशन और सीलोन में रॉबिन्सन हॉस्पिटल की स्थापना में उन्होंने भरपूर आर्थिक सहयोग दिया। फोस्टर तीस वर्षों तक उनका मार्गदर्शन और सहायता करती रहीं ।

अनागरिका धर्मपाल चार बार जापान यात्रा पर गए। 1889 1893, 1902 और 1913 | 1889 में पहली जापान यात्रा कर्नल अल्काट के साथ गए थे। धर्मपाल ने वहां कई शिक्षण संस्थानों और बुद्धिजीवी वर्ग से संवाद किया और बौद्ध धर्म और थेरवाद पर चर्चा की। सीलोन से जापान जाने वाला यह पहला बौद्ध प्रतिनिधिमंडल था। दूसरी यात्रा 1893 में जापान की बूसेकि कोफुके संस्था के निमंत्रण पर गए।, जिसका उद्देश्य भारत के बुद्ध गया मंदिर के उद्धार मिशन से बौद्ध जगत को परिचित कराना था। वहां का बौद्ध समाज भारत में बौद्ध परंपरा फिर से स्थापित करने के लिए चिंतित था। धर्मपाल के मिशन को समर्थन के लिए जापान के तेंतोकु मंदिर के गुरु ने कनागावा मंदिर में स्थापित सात सौ साल पुरानी बुद्ध की प्रतिमा उन्हें भेट दी और उन्हें पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया। धर्मपाल इस प्रतिमा को बुद्ध गया मंदिर में स्थापित करना चाह रहे थे लेकिन वहां के महंत ने इसकी अनुमति नहीं दी। 1895 में सरकारी हस्तक्षेप से इसे मंदिर में रखा गया लेकिन महंत के लोगों ने प्रतिमा को बाहर रख दिया। पटना के कमिश्नर के आदेश पर धर्मपाल ने वैधानिक कार्यवाही शुरू की। यह बुद्ध गया मंदिर केस के नाम से मशहूर हुआ। महंत इसे हिन्दू मंदिर साबित करना चाहता था जबकि बौद्ध अनुयायी इसे बौद्ध मंदिर मानते थे। वायसराय के आदेश पर बाहर पड़ी मूर्ति को बर्मा धर्मशाला में रखी गयी। हाई कोर्ट ने फैसला दिया कि बुद्ध गया मंदिर कभी भी हिन्दू मंदिर में परिवर्तित नहीं हुआ था और निश्चित तौर पर बुद्ध मंदिर था। इस निर्णय से बुद्धगया में बौद्ध समुदाय को पूजा की अनुमति मिल गयी लेकिन उस पर अधिकार महंत का बना रहा। महाबोधि सोसाइटी को वहां धर्मशाला बनाने की अनुमति मिल गयी। बुद्ध गया मंदिर पर बौद्धों के स्वामित्व की लड़ाई चलती रही। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बौद्ध जगत को बुद्ध गया मंदिर की स्थिति और न्यायिक लड़ाई के बारे में जागरूक करने के लिए अमेरिका, ब्रिटैन, चीन और जापान की वह यात्रा करते रहे। मेरी फोस्टर की मदद से उन्होंने 1908 में सिंहल बौद्धया पत्रिका, महाबोधि प्रिंटिंग प्रेस और कलकत्ता में महाबोधि का स्थाई कार्यालय खुल गया और जापान से लाई गयी मूर्ति को यहाँ नवनिर्मित धर्मराजिका चैत्य विहार में स्थाई तौर पर स्थापित किया गया।

लम्बी वैधानिक लड़ाई के बाद बुद्धगया विवाद अनागरिका धर्मपाल की मृत्यु के करीब सोलह साल बाद सुलझाया गया और 1949 में मंदिर का अधिकार महाबोधि सोसाइटी को मिल गया। बुद्धगया मंदिर के प्रबंधन के लिए एक समिति बनाई गयी जिसमे हिन्दू और बौद्ध दोनों को सामान भागीदारी थी। समिति का नाम महाबोधि सोसाइटी ऑफ़ इंडिया रखा गया। 1910 के बाद सीलोन में राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता आंदोलन ज़ोर पकड़ रहा था। धर्मपाल ने सीलोन में जन जागृति आंदोलन शुरू किया और सुदूर गांव गांव जाकर लोगो को धम्म शिक्षा और राष्ट्र चेतना की मशाल जलाना शुरू किया। राष्ट्र चेतना आंदोलन ने धर्मपाल को एक निडर और जुझारू जन नायक बना दिया और उन्हें लायन ऑफ़ लंका की उपाधि दी गयी। कोलंबो में फोस्टर हॉस्पिटल और महाबोधि कॉलेज स्थापित किया । 1915 में राष्ट्र विरोधी गतिविधियों के आरोप में धर्मपाल और भाई एडमंड को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके भाई की मृत्यु जेल में हो गयी और धर्मपाल को भारत भेज दिया गया।

भारत में उन्होंने अन्य बौद्ध स्थलों के उद्धार का कार्य शुरू किया। बुद्ध के प्रथम उपदेश स्थल सारनाथ उन दिनों जर्जर हालत में था। आसपास का इलाक़ा पशुओं का चरागाह था और ऐतिहासिक धरोहरों को तोड़ कर उनसे निजी आवास बना लिए गए थे। धर्मपाल ने बनारस के कलेक्टर को सारनाथ में बुद्ध मंदिर बनाने के लिए भूखंड आवंटित करने का अनुरोध किया। सरकार ने एक भूखंड मंदिर बनाने के लिए महाबोधि को आबंटित कर दिया। मेरी फोस्टर के सहयोग से एक और भूखंड भी खरीद लिया गया। सारनाथ में बौद्ध मंदिर मूलगंध कुटी विहार का शिलान्यास 3 नवंबर 1922 में किया गया। मंदिर निर्माण कार्य देखने के लिए धर्मपाल के सहायक सीलोन के देवप्रिय वलिसिंघे को भारत बुलाया । 11 नवम्बर 1931 को 200 फ़ीट ऊँचे मूलगंध कुटी विहार का उद्घाटन किया गया और उसमें बुद्ध की अस्थियों को स्थापित किया गया। धर्मपाल की अथक प्रयास और समर्पण से सारनाथ और बुद्धगया पुनः बौद्ध तीर्थस्थल बन गया और भारत में लुप्त बौद्ध धर्म का पुनरुद्धार हुआ। इसके बाद धर्मपाल सामाजिक और शैक्षणिक गतिविधियों में संलग्न हो गए। सारनाथ में औद्योगिक विद्यालय, कलकत्ता में पाली स्कूल और सीलोन में महाबोधि जर्नल और सिंघल बौद्धया का सञ्चालन देखने लगे। लंदन में लन्दन बौद्ध विहार की स्थापना की।
उनका स्वस्थ ख़राब होने की कारण 1931 में उन्होंने स्थाई तौर पर भारत आने का निर्णय लिया। सारनाथ आ कर उन्होंने भिक्षु बनने का निर्णय लिया और 13 जुलाई 1931 को उन्होंने रेवत महाथेरो से प्रब्रज्या ग्रहण की और देवमित्त धर्मपाल बन गए । 16 जनवरी 1933 को भिक्षु सिद्धार्थ अनुनायक महाथेरो से उपसम्पदा ग्रहण की।

भारत समेत सम्पूर्ण विश्व में बौद्ध धर्म को पुनर्जीवित करने के बाद 29 अप्रैल 1933 को सारनाथ में निर्वाण को प्राप्त हुए। जिस तरह बौद्ध धर्म का सन्देश लेकर अशोक की पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा सीलोन को बौद्धमय तीसरी सदी ईसापूर्व में किया था और वहां धम्म दर्शन स्थापित किया था और सम्पूर्ण जीवन वहीँ व्यतीत कर दिया था उसी तरह अनागरिक धर्मपाल ने भारत में बौद्ध धर्म और तीर्थ स्थलों को पुनर्जीवन दे, भारत भूमि में निर्वाण प्राप्त किया। उनकी समाधी मूलगंध कुटी विहार की पास बनाई गयी ।
धर्म की प्रति समर्पण और त्याग को मान्यता स्वरुप भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया और बौद्ध धर्म के शोध कार्य के लिए भारत सरकार ने दिल्ली में अनागरिक धर्मपाल फाउंडेशन की स्थापना की है । श्री लंका में भी धर्मपाल की स्मृति में कई स्मारक, विद्यालय, मार्ग और शोध संस्थान खोले गए हैं।

लेखक शकील सिद्दीकी साँची से प्रकाशित भारत के बौद्ध पत्रिका के मुख्य संपादक और श्रीलंका महाबोधि सोसाइटी साँची केंद्र के मुख्य सलाहकार हैं। अन्य प्रकाशन, बायोग्राफी अंजलीकरणियो, कहानी संग्रह साहिल, अनम और माहे

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