सारिपुत्र भगवान बुद्ध के दो मुख्य शिष्यों में थे। वह बौद्ध शासन में प्रवीण और अनुशासन प्रिय विद्वान थे। बौद्ध अभिधम्म पिटक को सूचीबद्ध करने में उनका बहुत योगदान था | बचपन के मित्र मोग्गल्लान के साथ सत्य की खोज और मृत्यु का रहस्य जानने के लिए युवावस्था में घर त्याग दिया। भगवान बुद्ध से दीक्षा लेकर धर्म गहन अध्ययन और मनन किया । दीक्षा के दो सप्ताह के अंदर उन्हें अर्हत्व प्राप्त हो गया । सारिपुत्र बुद्ध के सबसे प्रतिभाशाली, कुशल और समर्पित भिक्षु थे । थेरवादी परंपरा में सारिपुत्र को बुद्ध के बाद स्थान दिया गया है। बुद्ध शासन के नियमों और विधानों का कड़ाई से पालन करते थे। उनकी बुद्धिमता, प्रशासन क्षमता और बुद्धि के कारण उन्हें धर्म सेनापति भी कहा जाता है।
बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध के सभी पूर्व अवतारों में दो पुरुष शिष्य और दो महिला शिष्याएं होती थीं। गौतम बुद्ध के भी दो पुरुष शिष्य सारिपुत्र और महामोग्गल्लान तथा दो महिला शिष्याएं क्षेमा और उत्पलवर्ण थी। पाली ग्रन्थ के अनुसार पूर्व में सारिपुत्र एक धनी ब्राह्मण सारदा थे जिन्होंने अपनी सभी संपत्ति संघ को दान कर दी थी। पूर्व बुद्ध अनोमादासी एक बार सारदा के पास आये थे। उनके शिष्य निसभ के प्रवचन से प्रभावित हो कर अगले बुद्ध के मुख्य शिष्य होने की इच्छा ज़ाहिर की । बुद्ध ने उनके भविष्य का अध्ययन कर बताया कि ऐसा ही होगा। उनकी बातों से प्रसन्न हो कर यह बात उन्होंने अपने मित्र श्रीवर्धन से बताई । श्रीवर्धन सारदा के साथ बुद्ध अनोमादासी के पास गए और भावी बुद्ध के दूसरे मुख्य शिष्य बनने की इच्छा बताई। उन्होंने उनके भी भविष्य का अवलोकन किया और पुष्टि कर दी कि भावी बुद्ध के वह दूसरे शिष्य होंगे। दोनों मित्रों ने कई जन्मों तक कुशल कर्म का पालन किया और गौतम बुद्ध के समय सारदा सारिपुत्र और श्रीवर्धन महामोग्गल्लान हुए । सारिपुत्र का जन्म राजगृह के पास उपतिस्स नामक गांव में हुआ था| उनके पिता का नाम वानगुंटा और माता का नाम रूपसारी या सरखती था । जन्म से उनका नाम उपतिस्स था । उपतिस्स के छह भाई बहन थे। तीन भाई उपसेना, चंद और रेवत तीन बहने चल, उपचल और सीसुपचा। यह एक संयोग था कि उनके सभी भाई बहन संघ में शामिल हुए और अर्हन्त प्राप्त किये। बौद्ध दीक्षा के बाद बुद्ध ने उनका नाम माता के नाम पर सारिपुत्र रखा। कहीं कहीं उन्हें सरखती पुत्र भी कहा जाता है।
दीक्षा के बाद बुद्ध ने सारिपुत्र को प्रथम और महामोग्गल्लान को द्वितीय मुख्य शिष्य घोषित किया। इसका कारण उन्होंने बताया कि कई जन्मों के पहले ही उन्हें मुख्य शिष्य बनाने का निर्णय हो चुका था।
बुध ने दोनों को ज्ञान और चिंतन में सर्वश्रेष्ठ बताया था। सारिपुत्र का कार्य बुद्ध वचनों को संग्रहित करना और सूचीबद्ध करना था| प्रवचन के समय अवसर सारिपुत्र बुद्ध से प्रश्न करते और समाधान बताते। कभी कभी सारिपुत्र को प्रवचन देने का आदेश देते। दसुत्तर सूत्र और संगीति सूत्र का वाचन उन्होंने ही किया था। सारिपुत्र के प्रयास से विनय नियम को लागू किया गया और वह इसका पालन करते थे। एक बार सारिपुत्र बीमार पड़े और उन्हें लहसुन खाने की सलाह दी गयी। उन्होंने इंकार कर दिया क्योंकि स्वयं बुद्ध ने इसे वर्जित किया था। मोग्गल्लान की तरह सारिपुत्र भी ध्यान और चित्त चमत्कार के ज्ञाता थे, लेकिन वह उनका इस्तेमाल करने से बचते थे।
सारिपुत्र का परिनिर्वाण
सारिपुत्र का परिनिर्वाण बुद्ध से एक सप्ताह पहले हो गया था। एक दिन ध्यान से उन्हें मालूम हुआ कि उन्हें बुद्ध के महापरिनिर्वाण से पहले परिनिर्वाण प्राप्त करना है, इसके लिए सिर्फ सात दिन का समय था | बुद्ध की आज्ञा से वह अपने गृहनगर उपतिस्स गए और अपनी माता को दीक्षा दिया। इसके बाद कार्तिक पूर्णिमा के दिन उनका परिनिर्वाण हुआ। संजोग से उसी दिन महामोग्गल्लान का भी परिनिर्वाण विकट परिस्थिति में हुआ। सारिपुत्र का राजगृह में अंतिम संस्कार किया गया और उनके अस्थि अवशेष को सहायक चंद बुद्ध के पास जेतवन लाये। बुद्ध ने सारिपुत्र के ज्ञान, कौशल और समर्पण की प्रशंसा की और जेतवन में उनका स्तूप बनाया गया। सारिपुत्र ने अभिधम्म को सूचीबद्ध करने का कार्य किया। अभिधम्म बौद्ध धर्म के गूढ़ रहस्यों को परिभाषित करता है। थेरवाद परंपरा के अनुसार बुद्ध वर्षावास के लिए तवतीसा स्वर्ग में देवों को उपदेश देते थे। कहा जाता है की बुद्ध प्रतिदिन वापस आकर सारिपुत्र को अभिधम्म की परिभाषा समझाते जिसे वह क्रमबद्ध तरीके से सूचीबद्ध करते। आवश्यकता पड़ने पर अन्य भिक्षुओं को भी अभिधम्म समझाते | इसे अभिधम्म पिटक कहा गया जो त्रिपिटक का एक भाग बन गया। अभिधम्म को परभाषित करने के कारण उन्हें अभिधम्म दाता भी कहा जाता है।
महामोग्गल्लान
श्रद्धांजलि उस भिक्षु को जो ब्रह्म जैसा है, पल भर में अपनी आँखों के सामने हज़ार गुना ब्रह्माण्ड को देख सकता है, जादुई शक्तियों का स्वामी ह, वह समय के प्रवाह में भी देवताओं की उत्पत्ति और मृत्यु देख सकता है। थेरगाथा १९८९
मगध राज्य में कई छोटे छोटे उपनगर थे उनमें मोगलान नगर में एक ब्राह्मण परिवार के घर कोलिथ का जन्म हुआ। यह परिवार मुगद्गल कबीले के वंशज थे इन्हें मोगलन्स भी कहा जाता था। कोलिथ के पिता अत्यंत संपन्न और रूढ़िवादी थे। कोलिथ की शिक्षा दीक्षा पारम्परिक रीति से शुरू हुई थी जो कर्म सिद्धांत पर आधारित थी जो वर्तमान जीवन से परे अन्य जीवन पर विश्वास करता था| मोगलान नगर से थोड़ी दूर उपतिस्स गांव में एक ब्राह्मण परिवार वानगुंटा का था जिससे उनके मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध थी। कोलिथ के जन्म के दिन ही उनके यहाँ भी एक पुत्र हुआ जिसका नाम उपतिस्सा रखा गया । उपतिस्सा में बचपन से ही नेतृत्व क्षमता, साहस और परिश्रम के गुण थे, कोलिथ सरल, शांत और कृषि कार्य में दक्ष था। बचपन से ही दोनों अभिन्न मित्र थे, कभी झगड़ते नहीं और दोनों एक दूसरे का सम्मान करते थे । कोलिथ एकलौती संतान थे और उपतिस्सा के तीन भाई और तीन बहनें थीं। युवावस्था में दोनों मित्र साथ रहते और शिक्षा पाया था। दोनों हर वर्ष गिरी महोत्सव देखने जाते थे । कुछ दिनों बाद उनका इस तरह के समारोहों और मनोरंजन से मोह भंग हो गया और वैराग की ओर झुकाव हो गया। दोनों मित्रों ने तपस्वी जीवन बिताने का निर्णय किया और घर त्याग दिया। एक योग्य गुरु की तलाश में बहुत दिनों तक भटकते रहे। यह उस समय की घटना है जब सिद्धार्थ गौतम का विवाह हुआ था। अलग अलग विचारधारा और सिद्धांतों वाले गुरुओं से उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। अंत में राजगृह के एक सन्यासी गुरु संजय वैरातिपुत्र
से इनकी भेंट हुई। पाली ग्रन्थ के अनुसार उनका उल्लेख छह गैर बौद्ध गुरुओं में आता है। वह हठधर्मी परंपरा के समर्थक थे । समस्याओं के समाधान के तार्किक विकल्प पर उनकी राय स्पष्ट नहीं थी । उन्होंने दावा नहीं किया कि कोई दुनिया से परे नहीं है, कोई सूक्ष्म शरीर नहीं है, कर्म का कोई विधान नहीं है और मृत्यु के बाद कोई अस्तित्व नहीं है। उनका दृष्टिकोण भौतिकवादियों से भिन्न था, उनके विचार से समस्याओं को अनार्य भाव से देखते हुई उसके अनुमोदन या अस्वीकृति के लिए निष्पक्षता का भाव अपनाना चाहिए। उनका सिद्धांत भौतिकवाद का कभी कभी समर्थन करता था। प्राम्भ में दोनों अपने गुरु से काफी प्रभावित थे, लेकिन कुछ समय बाद उनका मोहभंग हो गया। उनकी शंकाओं सार्वभौमिक पीड़ा का उपचार, कर्मों के पुनर्मिलन पर उनका कोई स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं था। इन विषयों पर विस्तार से चर्चा करने के आग्रह पर उन्होंने कहा कि मेरे पास जितना ज्ञान था मैंने दे दिया अब मेरे पास देने को कुछ नहीं बचा है। दोनों ने उनका साथ छोड़ दिया और वर्षों तक शंका समाधान खोजते रहे। विभिन समदाय के कई गुरुओं से संपर्क किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। बीस वर्षों तक दोनों भ्रमण करते रहे। बाद में पुनः राजगृह आश्रम आ गए
भगवान बुद्ध ने धर्मचक्र प्रवर्तन के बाद अपने शिष्यों को धर्म प्रचार के लिए भेजा था | भगवान बुद्ध उन दिनों राजगृह के पास जेतवन में थे। एक दिन उपतिस्स नगर भ्रमण पर गए और वापस आने पर अत्यंत प्रसन्नचित और निर्विकार लगे मानो उन्हें अपने प्रश्नों का समाधान मिल गया। कोलिथ ने पूछा, ” मित्र तुम्हारी काया निर्मल और देदीप्यमान लग रही है, क्या आप को मृत्यु का रहस्य मालूम हो गया है? ”
“हाँ मित्र, मुझे अपनी शंकाओं के समाधान के लिए योग्य गुरु का पता मिल गया है “। उपतिस्स ने बताया उन्होंने बताया कि नगर में एक चीवर धारी साधु से मुलाक़ात हुई। उनके व्यवहार और तेज से प्रभावित हो मैंने उनसे गुरु का परिचय पूछा। उन्होंने अपना नाम अस्सजी बताया जो बुद्ध के पहले पांच शिष्यों में एक थे और साठ अर्हन्तों में भी । मैंने धर्म की व्याख्या का अनुरोध किया तो उन्होंने विस्तार से बताने में असमर्थता व्यक्त की क्योंकि वह कुछ महीने पहले ही संघ में आये थे इसलिए बुद्ध से मिलने का आग्रह किया। भिक्षु अस्सजी ने मुझे बुद्ध के सिद्धांत का एक श्लोक सुनाया, हेतु धम्म सूत्र | किसी चीज़ की उत्पत्ति और अंत बिना कारण नहीं होता|जिसे सुनते ही मुझे सत्य का आभास हुआ। मुझे ज्ञान हुआ कि जो भी पैदा होता है लुप्त हो जाता है। उन्होंने बताया कि इस श्लोक का अर्थ पूरी तरह समझना आसान नहीं है। लम्बे समय तक त्याग और तपस्या में लीन व्यक्ति को ही ज्ञान प्राप्त होता है, जो बिना शर्त चीज़ों को परखने का आदी हो । उपतिस्स ने कोलिथ को पूरा श्लोक सुनाया। दोनों मित्र सोतापन्न की स्थिति में आ गए। उन्हें मृत्यु से परे निर्वाण की दृष्टि का आभास हुआ। यह जानकर कि बुद्ध जेतवन में है वहां जाने की इच्छा हुई । उपतिस्स ने पहले अपने गुरु संजय को बताने और उन्हें भी साथ ले चलने का प्रस्ताव रखा। पांच सौ शिष्यों के गुरु संजय वहां जाने को तैयार नहीं हुए लेकिन उनके दो सौ पचास शिष्य बुद्ध से मिलने को तैयार हो गए।
जब दोनों दो सौ पचास तपस्वियों के साथ जेतवन पहुंचे तो बुद्ध उस समय उपदेश दे रहे थे । उन्हें देख भिक्षुओं से कहा,
” भिक्षओं, देखो दो मित्र कोलिथ और उपतिस्स आ रहे है, भविष्य में ये दोनों मेरे मुख्य शिष्य होंगे “। दोनों ने भगवान बुद्ध से दीक्षा की प्रार्थना की। बुद्ध ने कहा, बुद्ध ने “आओ साधुओं, जीवन और उसकी शुद्धता तथा दुःख के अंत के लिए तुम्हें संघ में शामिल किया जाता है “। दीक्षा के बाद उपतिस्स को उनकी माता सारि के नाम पर सारिपुत्र और कोलिथ को उनके गांव के नाम पर मोग्गल्लान नाम दिया गया। सारिपुत्र राजगृह में रुक गए और भालू की गुफा में ध्यान करने लगे और बुद्ध के उपदेश भी सीखते। अपनी साधना से उन्होंने चित्त और उसके नियम का अवलोकन किया और चौदह दिन बाद अर्हन्त बन गए। बचपन से ही सदैव साथ रहने वाले दोनों मित्र पहली बार अलग हुए। मोग्गल्लान मगध के पास कलावलपुट वन में ध्यान साधना करने लगे। कठिन साधना के कारण उन्हें अनिद्रा रोग हो गया। बुद्ध ने दिव्य दृष्टि से इसका अवलोकन किया और वहां जा कर उनकी व्याधि से छुटकारा दिलाया|
मोग्गल्लान बुद्ध के सभी निर्देशों का पालन करते हुई खुद को प्रशिक्षित किया। पांच आतंरिक बाधाओं के खिलाफ संघर्ष शुरू किया। कई वर्षों से तपस्वी जीवन के कारण पहले से ही कामुक इच्छा और दुर्बलता को दबा चुके थे जो पहली और दूसरी बाधा है। उन्होंने सुस्ती और आलस्य को जीत कर तीसरी बाधा दूर की। बेवजह सामाजिक संपर्कों से बच कर चौथी बाधा बेचैनी और चिंता से मुक्त हुए। अंत में संदेह से परे पांचवी बाधा को नियंत्रित कर निर्वाण के द्वार पर पहुँच गए। बुद्ध के मार्गदर्शन और निर्देश का पालन कर उन्होंने ज्ञान की पराकाष्ठा को प्राप्त किया और एक सप्ताह के बाद अर्हन्त बन गए ।
बुद्ध अपने शिष्यों की तुलना राज्य प्रशासन से करते थी। आनंद के प्रवचनों को याद करने की योग्यता के कारण उन्हें वित्त मंत्री, सारिपुत्र के धम्म ज्ञान और पालन के कारण धम्म सेनापति, और मोग्गल्लान को बच्चे के सेवक और रिद्धि सिद्धि के ज्ञाता के रूप में पहचान बताई इन चारो में बुद्ध और आनंद छत्रिय थे और उनका जन्म एक ही दिन हुआ था, वहीं सारिपुत्र और मोग्गल्लान ब्राह्मण थे और उनका भी जन्म एक ही दिन हुआ था| जब बुद्ध ने दोनों को अपना मुख्य शिष्य घोषित किया और आदेश दिया की धर्म सभाओं में धर्म सेनापति सारिपुत्र मेरे दाहिने और रिद्धि सिद्धि के विद्वान् महामोग्गल्लान मेरे बायीं तरफ बैठेंगे तो संघ में कुछ भिक्षुओं ने इसका विरोध किया क्योंकि कई वरिष्ठ भिक्षु संघ में मौजूद थे । बुद्ध ने अपने शिष्यों के बारे में कहा, “भिक्षुओं, मेरे शिष्यों में दोनों उत्कृष्ट और असाधारण हैं। उन्होंने तथागत के निर्देशों का उचित पालन करके श्रेष्ठ स्थान पाया है। ये सबके प्रिय और स्नेही है इसलिए संघ के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।
ज्ञान की परिधि के बारे में बुद्ध ने कहा था कि कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनका उत्तर सिर्फ मैं दे सकता हूँ, सारिपुत्र नहीं । कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनका स्पष्टीकरण सारिपुत्र दे सकते हैं, मोग्गल्लान नही। कुछ शंकाओं का समाधान मोग्गल्लान के पास है अन्य शिष्यों के पास नहीं। ”
दोनों की योग्यता के कारण ही बुद्ध ने अपने पुत्र राहुल की देखरेख और शिक्षा का दायित्व इनको दिया था।
मोग्गल्लान की आध्यात्मिक शक्ति
अपनी रिद्धि सिद्धि साधना के बल पर महामोग्गल्लान कई चमत्कारिक शक्तियों पर विजय पा चुके थे । दूसरों के मन में उठने वाले विचार और क्रिया को समझना, साध्य श्रवण शक्ति से दूर बैठे व्यक्ति से संवाद, दूर दृष्टि से लोगों से साक्षात्कार करने में सक्षम थे। सूक्ष्म गति साधना से कहीं भी तीव्र भ्रमण में सक्षम थे। अपनी अलौकिक माया से दूर से किसी वस्तु को ला सकते थे। एक बार सारिपुत्र के लिए हिमालय से कमल लाये थी।
मोग्गल्लान के पूर्व जन्म की कथा |
मज्झिम निकाय के पचासवें उपदेश में महामोग्गल्लान ने पूर्व जन्म में अपने, बुद्ध और सारिपुत्र के संबंधों की व्याख्या की थी। जातक कथाओं में बुद्ध और महामोग्गल्लान से सम्बंधित कई घटनाएं हैं। लगभग इकत्तीस जीवन में दोनों साथ साथ थे। बीस जन्मों में सारिपुत्र और महामोग्गल्लान का साथ रहा है। जातक कथाओं में बुद्ध के साथ दोनों कभी मित्र, कभी मंत्री, कभी सन्यासी शिष्य और कभी शिक्षक के रूप में थे । बुद्ध के सक्क अवतार में दोनों चंद्र और सूर्य देवता थे। पूर्व जन्म में सारिपुत्र सदैव महामोग्गल्लान से श्रेष्ठ पद पर रहे। राजकुमार और सहायक, मंत्री और दास पुत्र, बोधिसत्व के सारथी और राजा आनंद के सारथी| सिर्फ एकबार मोग्गल्लान चंद्र देवता और सारिपुत्र सन्यासी नारद थे | एक बार सारिपुत्र नागराजा थे और मोग्गल्लान उनके शत्रु सुपन्ना थे। जातक कथा कुरु विधान में सारिपुत्र व्यापारी और मोग्गल्लान चौकीदार थे।
महामोग्गल्लान का परिनिर्वाण
बुद्ध के महापरिनिर्वाण के पहले ही महामोग्गल्लान को अपने परिनिर्वाण का आभास हो गया था| उनका अंत बहुत ही क्रूर और पीड़ादायक था, क्योंकि पूर्व जन्म के कुछ कर्म फलीभूत नहीं हुए थे। बुद्ध से आज्ञा ले कर वह कलसिल जंगल में रहने लगे। निर्वाण और असीम आनंद में लीन रहने लगे। एक दिन उन्होंने कुछ लूटेरों को कुटिया में आते देखा। अपनी दिव्य शक्ति से समझ गए कि विरोधियों द्वारा उनको नुकसान पहुँचाने के लिए भेजा गया है इसलिए वह बाहर चले गए। यह क्रिया छह दिनों तक चली। सातवें दिन अपनी ज्ञान चक्षु से अपने कर्म फल का अवलोकन किया और मालूम हुआ कि अपने माता पिता की मृत्यु का कारण वह बने थे इसलिए कर्म फल को भोगे बगैर निर्वाण नहीं होगा । इसलिए सातवें दिन वह कहीं नहीं गए। धन की लालसा में लूटेरों ने उनपर कई आघात किया और अंगभंग कर दिया | मरा हुआ समझ सब चले गए। अपनी इच्छा शक्ति के बल पर चेतन अवस्था में आये और बुद्ध के पास पहुँच गए। उनकी उपस्थिति में संसार के सबसे पवित्र स्थल पर वह परिनिर्वाण को प्राप्त हुए । उनकी उम्र 84 साल थी।
दोनों के निर्वाण पर भगवान बुद्ध ने उपस्थित संघ से कहा, ” कितने गौरव की बात है की खाली पड़े आसन पर कभी संसार की दो विभूतियाँ बैठी थीं।” बुद्ध के चेहरे पर कोई शोक या दुःख नहीं था
बुद्ध ने जेतवन में सारिपुत्र और महामोग्गल्लान की अस्थियों पर एक स्तूप बनवाया
साँची चेतियगिरि विहार के विहाराधिपति और श्रीलंका महाबोधि सोसाइटी के अध्यक्ष वेन बानगल उपतिस्स नायक थेरो ने साँची के विस्तार और विकास पर सिलसिलेवार चर्चा की। साँची के बारे में उनके विचार प्रस्तुत है:-
महापरिनिर्वाण सूत्र में भगवान बुद्ध ने चार स्थलों लुम्बिनी, बोधगया, इसीपत्तन (सारनाथ) और कुशीनगर को बौद्ध जगत के लिए पवित्र स्थान कहा था। यद्यपि भगवान बुद्ध कभी साँची नहीं पधारे लेकिन इसका महत्व थेये महेंद्र और शेरनी संघमित्रा के श्रीलंका आगमन के कारण ही बढ़ा। दोनों साँची से ही श्रीलंका आये थे और 2300 साल पहले पवित्र बोधि बृक्ष की शाखा लाये जिसे अनुराधपुर स्थापित किया गया है| साँची, सम्राट अशोक के 84000 धर्मराजिक स्थलों में शुमार था। शेरो महेंद्र के प्रयास से ही त्रिपिटक का सिंघल प्राकृत भाषा में अनुवाद किया गया|
बीसवीं सदी में श्रीलंका के अनागरिक धर्मपाल ने भारत में बौद्ध धर्म को पुनर्स्थापित किया और तीर्थ स्थलों का जीर्णोद्धार किया| साँची स्तूप के तोरण द्वारों में भगवान बुद्ध के जीवन, दर्शन और उपदेशों को प्रदर्शित किया गया है। श्रीलंका ने साँची को अंतराष्ट्रीय बौद्ध तीर्थ स्थल के रूप में स्थापित किया है।
बारहवीं सदी के बाद साँची विलुप्त हो गया था। 1818 में ब्रिटिश अधिकारी जनरल टेलर ने साँची के अस्तित्व को खोज निकाला। 1851 के आसपास कप्तान मेसी ने ख़ज़ाने की खोज में स्तूप नंबर 3 को खोद डाला। वहां से दो अस्थि मंजुषा मिली जिस पर ब्राह्मी भाषा में सा और मा लिखा हुआ था। ब्रिटेन के तत्कालीन पुरातत्वविद एलेग्जेंडर कनिंघम ने इन्हें अरहत सारिपुत्र और अरहत मोगलांना की पवित्र अस्थियां सत्यापित की। इन अस्थियों को वह इंग्लैंड ले गया और विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में रख दिया | जेतवन से साँची लाई गयीं दोनों की अस्थियों को साँची स्तूप के पास एक स्तूप में रखने का निर्णय अशोक द्वारा लिया गया। ऐसा बताया जाता है कि धम्म संघ के कुछ अनुयायियों ने अस्थियों का कुछ भाग चोरी कर लिया। अशोक के कोप के डर से इसे प्रचारित नहीं किया गया और बचे हुए अवशेषों को वर्तमान के स्तूप 3 रख दिया गया लेकिन लुप्त हुए भाग कि खोज होती रही। राजकीय दंड दंड से बचने के लिए साँची से थोड़ी दूर सतधारा के पास इसे एक स्तूप बना कर उसमें रख दिया गया, जो सतधारा स्तूप के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
स्तूप ३ से मेसी द्वारा अस्थियों को खोजने और एलेग्जेंडर द्वारा सत्यापित कर इंग्लैंड ले जाने पर मेसी को कुछ हाथ नहीं लगा। इसलिए उसने सतधारा के स्तूप को खोद कर वहां से दोनों के अस्थि अवशेष को बाहर निकाला। उसका उद्देश्य धन खोजना था। उसे कितना और क्या धन मिला यह ज्ञात नहीं हो सका। मेसी इन अस्थियों को लेकर इंग्लैंड के संग्रहालय के अधिकारीयों से मिला, लेकिन इन अस्थियों का कोई सत्यापन न होने से संग्रहालय ने इन्हें रखने से इंकार कर दिया। मेसी उन्हें लेकर कहाँ गया किसी को पता नहीं चल सका। यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार द्वारा संगहालय से भेजी गयी अस्थियां स्तूप ३ में ही मिली थीं। 1935 में महाबोधि सोसाइटी ने इंग्लैंड से अस्थियों को लाने का प्रयास किया। भोपाल नवाब ने साँची में अस्थियों को स्थापित करने के लिए भूखंड दिया और 30 नवम्बर 1952 में चेतियगिरि विहार बन जाने पर भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा अस्थियां यहाँ लाई गयीं। इस अवसर पर उपराष्ट्रपति श्री एस राधाकृष्णन, बर्मा और कम्बोडिया के प्रधान मंत्री, महाबोधि सोसाइटी के अध्यक्ष श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित कई राजनयिक उपस्थित थे। इसी परंपरा को कायम रखते हुए हर वर्ष नवम्बर माह के आखिरी रविवार को 68 वर्षों से साँची मेला आयोजित किया जाता है।
मैं 1968 में साँची 18 वर्ष की आयु में आया था। विदिशा और भोपाल से शिक्षा पूरी की। 53 वर्षों से मैंने साँची के गौरव और इतिहास को देखा है। साँची की धम्म परंपरा और संस्कृति से जुड़ने का अवसर मिलने पर मैं अपने को सौभाग्यशाली समझता हूँ। लेखक और पत्रकार श्री अम्बुज माहेश्वरी ने साँची मेला की ६८ वर्षों की यात्रा को अपनी पुस्तक साधु- साधु ” में विस्तार से संकलित किया है। उनके सराहनीय और अथक प्रयास को
साधुवाद।